Skip to main content

भारतवंशी विश्‍व की अनोखी धरोहर

*प्रगित परमेश्‍वरन

1990 में जब सद्दाम हुसैन की ईराकी सेनाओं ने कुवैत पर हमला किया तो मुतुन्नि मैथ्‍यूज ने, जिन्‍हें टोयोटा सनी के नाम से अधिक पहचाना जाता है, मसीहा मैथ्‍यूज बनकर वहां फंसे भारतीयों की जीवन रक्षा की. सनी ने जैसा अनोखा कार्य किया उससे कुवैत युद्ध में फंसे 1,70,000 हजार भारतीयों को 488 उड़ानों के जरिए भारत लाने में बड़ी मदद मिली.


2017 का साल भारतवंशियों के लिए सबसे बड़े नुकसान का साल कहा जा सकता है क्‍योंकि इसमें एक बॉलीवुड फिल्‍म के प्रेरणा स्रोत रहे टोयोटा सनी इस दुनिया से चल बसे. लेकिन ऐसे कई प्रवासी भारतीय (एनआरआई) हैं जिन्‍होंने राष्‍ट्र के इतिहास के विभिन्‍न कालखंडों में भारत को गौरवान्वित किया है.


गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई से लेकर नोबेल पुरस्‍कार विजेता वैज्ञानिक हर‍गोविंद खुराना तक और माइक्रोसॉफ्ट के सीईओ सत्‍या नडेला तथा जानेमाने संगीत निर्देशक जुबिन मेहता जैसे प्रवासी भारतीयों की सूची बड़ी लंबी है और विश्‍व के प्रति उनके अवदान भी अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण है.


आज हमें जीवन के तमाम क्षेत्रों में भारतीय नजर आते हैं. चाहे फिल्‍मकार हों, वकील हों, पुलिसकर्मी हों, लेखक हों या व्‍यापारी हों, दुनिया भर में विभिन्‍न क्षेत्रों में प्रवासी भारतीयों ने अपनी प्रतिभा के झंडे गाड़े हैं.


राष्‍ट्र आज दुनिया में सबसे अधिक प्रवासी देने वाला देश होने का दावा कर सकता है क्‍येांकि भारतीय मूल के तीन करोड़ से भी अधिक लोग आज विदेशों में प्रवास करते हैं. हालांकि कुल संख्‍या की दृष्टि से प्रवासी भारतीयों की तादाद देश की कुल जनसंख्‍या का मात्र एक प्रतिशत है, लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि ये लोग भारत के सकल घरेलू उत्‍पाद में 3.4 प्रतिशत का योगदान करते हैं. पिछले साल जारी विश्‍व बैंक की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत 2015 में प्रवासियों द्वारा सबसे अधिक रकम प्राप्‍त करने वाला देश था क्‍योंकि इस दौरान उसे 69 अरब डालर की अनुमानित आमदनी हुई.


भारतवंशियों की छवि कुशल, शिक्षित और धनी समुदाय के रूप में उभरी है. पिछले दशक में व्‍यापार, पूंजी और श्रम के वैश्‍वीकरण की बुनियाद मजबूत होने से अत्‍यंत कुशल प्रवासी भारतीयों की तादाद में जबरदस्‍त इजाफा हुआ है.


भारत के करीब 3 करोड़ प्रवासी जिन-जिन देशों में रह रहे हैं वहां की तमाम महत्‍वपूर्ण जिम्‍मेदारियां और भूमिकाएं निभा रहे हैं और इस तरह इन देशों की नियति का निर्धारण करने में योगदान कर रहे हैं. सिंगापुर के राष्‍ट्रपति, न्‍यूजीलैंड के गवर्नर जनरल और मारीशस तथा ट्रिनिडाड-टोबैगो के प्रधानमंत्री भारतीय मूल के हैं.


ड्यूक विश्‍वविद्यालय और कैलीफोर्निया विश्‍वविद्यालय द्वारा कराए गये एक अध्‍ययन के अनुसार अमेरिका में 1995 से 2005 तक प्रवासियों द्वारा स्‍थापित इंजीनियरी और आईटी कंपनियों में से एक चौथाई से ज्‍यादा भारतीयों की थीं. इतना ही नहीं देश के होटलों में से करीब 35 प्रतिशत के स्‍वामी प्रवासी भारतीय ही थे.


अमेरिका की सन् 2000 की जनगणना के अनुसार वहां रह रहे प्रवासी भारतीयों की औसत वार्षिक आय 51 हजार डॉलर थी जबकि अमेरिकी नागरिकों की औसत वार्षिक आय 32 हजार डॉलर थी. करीब 64 प्रतिशत भारतीय-अमेरिकियों के पास स्‍नातक की डिग्री या इससे ऊंची शैक्षिक योग्‍यताएं थीं जबकि डिग्रीधारी अमेरिकियों का समग्र औसत 28 प्रतिशत और डिग्रीधारी एशियाई-अमेरिकियों का औसत 44 प्रतिशत था. करीब 40 प्रतिशत भारतीय-अमेरिकियों के पास स्‍नातकोत्‍तर, डाक्‍टरेट या अन्‍य पेशेवर डिग्रियां थीं जो अमेरिकी राष्‍ट्रीय औसत से पांच गुना अधिक है. विदेशों में जब भारतीय मूल के किसी व्‍यक्ति को सम्‍मान मिलता है तो इससे हमारे देश का भी सम्‍मान होता है और भारत बारे में लोगों की समझ बढ़ती है. प्रभावशाली भारतवंशी न सिर्फ उस देश के जनमत पर असर डालते हैं बल्कि वहां की सरकारी नीतियों पर भी उसका प्रभाव पड़ता है जिसका लाभ भारत को मिलता है. भारत को इन लोगों के माध्‍यम से एक बड़ा फायदा यह भी होता है कि वे बड़ी बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों और उद्यमिता वाले उपक्रमों को भारत जाने को प्रेरित करते हैं.


सरकार ने भारत के विदेश नीति संबंधी कार्यक्रमों के माध्‍यम से स्‍वदेश में बदलाव लाने पर जोर देना जारी रखे हुए है.


स्‍वदेश लौटकर नया कारोबार शुरू करने वाले भारतवंशी अपने साथ तकनीकी और किसी खास कार्यक्षेत्र की विशेषज्ञता लेकर आते हैं जो देश के लिए बड़े मददगार कारोबारी साबित होते हैं. विदेशों में कार्यरत शै‍क्षणिक क्षेत्र के भारतवंशी भारतीय शिक्षा संस्‍थाओं में शिक्षा की गुणवत्‍ता में सुधार के लिए स्‍वेच्छा से अपना समय और संसाधन मुहैया करा रहे हैं. इंडो यूनीवर्सल कोलैबोरेशन ऑफ इंजीनियरिंग एजुकेशन की सदस्‍य संस्‍थाएं इसका उदाहरण हैं. इसका पता मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया, डिजिटल इंडिया, स्‍टार्ट अप इंडिया के साथ-साथ बुनियादी ढांचे तथा परिवहन संपर्क सुधारने और शहरी व ऊर्जा क्षेत्र में चहुंमुखी  टिकाऊ विकास को बढ़ावा देने के लिए सरकारी प्रयासों अथवा निजी वाणिज्यिक समझौतों से चलाई जा रही परियोजनाओं से साफ तौर पर चल जाता है.      


प्रवासियों के अनुकूल नीतियां

सरकार प्रवासी भारतीयों के रूप में अपनी सबसे बड़ी पूंजी की सुरक्षा को सर्वोच्‍च प्राथमिकता देना जारी रखे हुए है जिसके लिए अनेक नीतियां बनायी गयी हैं और पहल की गयी हैं. प्रवासन की प्रक्रिया को और अधिक सुरक्षित, व्‍यवस्थित, कानून-सम्‍मत और मानवीय बनाने के लिए संस्‍थागत ढांचे में सुधार के मंत्रालयके प्रयास भी जारी हैं.

प्राथमिकता वाला एक क्षेत्र है प्रवासन चक्र के विभिन्‍न चरणों, जैसे विदेश रवानगी से पहले, गंतव्‍य देश में पहुंचने और वहां से वापसी के समय प्रवासी कामगारों को मदद देने वाले समूचे तंत्र को सुदृढ़ करना. प्रवासी भारतीय श्रमिकों के कौशल में सुधार और उनके व्‍यावसायिक कौशल के प्रमाणन के लिए नयी पहल की गयी हैं.   


2 जुलाई, 2016 को विदेश मंत्रालय और कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय ने एक समझौता ज्ञापन पर दस्‍तखत किये जिसका उद्देश्‍य प्रवासी कौशल विकास योजना (पीकेवीवाई) पर अमल करना था. राष्‍ट्रीय कौशल विकास निगम इस योजना को लागू करने के लिए इंडिया इंटरनेशनल स्किल सेंटर्स स्‍थापित करने की दिशा में प्रयासरत है जिन्‍हें स्‍थानीय जरूरतों के अनुरूप अनुकूलित किया जाएगा. 


पिछले साल गांधी जयंती के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने नई दिल्‍ली में प्रवासी भारतीय केन्‍द्र का उद्घाटन किया और इसे भारतवंशियों को समर्पित किया. इस केन्‍द्र की स्‍थापना का उद्देश्‍य दुनिया भर में फैले भारतवंशियों द्वारा विदेशों रह कर किये गये परिश्रम और धैर्य का स्‍मरण करना और उसके परिणामस्‍वरूप हासिल उपलब्धियों और विकास की ओर ध्‍यान आकृष्‍ट करना है.


भारत के महानतम प्रवासियों में से एक -- महात्‍मा गांधी की दक्षिण अफ्रीका से स्‍वदेश वापसी की स्‍मृति में देश में हर साल प्रवासीय भारतीय दिवस का आयोजन किया जाता है. इसमें देश-विदेश में भारतवंशियों के योगदान को याद किया जाता है. 

***

लेखक कई अखबारों और समाचार संगठनों में कार्य कर चुके हैं. फिलहाल वह मीडिया कंसल्‍टेंट के तौर पर कार्य कर रहे हैं. इस लेख में व्‍य‍क्‍त विचार उनके निजी विचार हैं. अनुवाद : राजेन्‍द्र उपाध्‍याय



--
Kumar Vivek
Journalist
9523745572

Comments

Popular posts from this blog

एनडीए के साथ जाना नीतीश का सकारात्मक फैसला : श्वेता सिंह (एंकर, आजतक )

Shweta during coverage बिहार की वर्तमान राजनिति पर नयी नज़र के साथ जानी-मानी आजतक पत्रकार बिहारी श्वेता सिंह से   खास बातचीत  पटना : बुधवार को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस्तीफा देने के बाद गुरुवार को सुबह दोबारा एनडीए के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण कर लिया. इस बीच राजधानी पटना में राजनैतिक चर्चाओं का बाजार उफान पर रहा. गुरुवार को अहले सुबह से ही तमाम मीडियाकर्मी राजभवन के बाहर शपथ ग्रहण को कवरेज करने के लिए मौजूद थे. इस इवेंट को कवरेज करने के लिए आजतक टीवी की जानी-मानी पत्रकार श्वेता सिंह भी विशेष रूप से पटना पहुंची थीं. श्वेता स्वयं एक  बिहारी हैं और बिहार के वैशाली जिले के महुआ से आतीं हैं. श्वेता लोगों से इस राजनैतिक घमासा न पर जमकर सवाल पूछतीं नज़र आईं. इस दौरान नयी नज़र के ब्लॉगर कुमार विवेक ने बिहार के बदलते घटनाक्रम पर श्वेता सिंह से बातचीत की, इसके मुख्य अंश हम आपसे साझा कर रहे है. ___ सवाल : श्वेता, देश की जानी-मानी पत्रकार होने के नाते बिहार के इस वर्त्तमान राजनैतिक घटनाक्रम को किस रूप में देखती हैं? जवाब : देखिये, एक पत्रका...

निजता का अधिकार : अपने ही बुने जाल में फँस गयी सरकार !

 - कुमार विवेक  साल था २०१५, सुप्रीम कोर्ट में तीन जजों की बेंच के सामने एक बहस चल रही थी. मामला था ज्यादातर सरकारी योजनाओं के लिए आधार कार्ड को अनिवार्य बनाये जाने का.  आधार को कानूनी तौर पर लागू करने की कोशिश कर रही भारत सरकार के वकीलों ने कोर्ट में यह तर्क दिया कि , "हो सकता है कि आधार लोगों की निजता में दखल देता हो, पर क्या निजता का अधिकार मौलिक अधिकार है? इस तर्क के साथ निजता के अधिकार की मौलिकता पर ही सवाल खड़े कर दिए गए.  तीन जजों की पीठ ने वकीलों की दलील  मान ली और इस मामले को फैसला देने केलिए संवैधानिक पीठ के हवाले कर दिया.  इस संवैधानिक पीठ में मुख्य न्यायाधीश जे.एस. खेहर, जस्टिस जे. चेलमेश्वर, जस्टिस एस.ए. बोबडे, जस्टिस आर.के. अग्रवाल, जस्टिस आर.एफ़. नरीमन, जस्टिस ए.एम. सप्रे, जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़, जस्टिस एसके कौल और जस्टिस एस अब्दुल नज़ीर शामिल थे. इसी संवैधानिक पीठ ने सर्वसम्मति से एक ऐतिहासिक फैसला देते हुए अब यह मान लिया है कि निजता का अधिकार एक मौलिक है. सुप्रीम कोर्ट ने व्यक्ति कि  निजता को संविधान के अनुच्छेद ...

बिहार बाढ़ : ७५ गावों तक सेना पहुंची, हज़ारों लोगों को बचाया

बिहार में बाढ़ से बुरी तरह से प्रभावित मधुबनी,सीतामढ़ी,गोपालगंज और मुजफ्फरपुर जिलो में नागरिक प्रशासन के अनुरोध पर सेना को बचाव और राहत अभियान के लिए तैनात किया गया है। सेना के जवान दूर-दराज के इलाको में बाढ़ में फंसे नागरिको को बचाने के साथ-साथ राहत सामग्री प्रदान करने के कार्य में लगातार जुटे हैं।   अंतिम समाचार मिलने तक सेना के जवान 75 गांवो तक पहुंचने में सफल रहे और उन्होंने एक हजार से अधिक लोगो को सुरक्षित बचाया। इसके साथ-साथ सेना ने इन क्षेत्रो में खाद्य और बचाव तथा राहत सामग्री का वितरण भी किया है। बचाव दल के साथ तैनात सेना के स्वास्थ्य दल ने दवा वितरण,आपातकालीन स्वास्थ्य सहायता के साथ-साथ कई लोगो का अमूल्य जीवन बचाया है। सेना द्वारा बचाए गए लोगो में गर्भवती महिलाएं भी सम्मिलित हैं। -- Kumar Vivek Journalist 9523745572